The Beauty Of A Woman
The beauty of a woman
isn't in the clothes she wears,
The figure that she carries,
or the way she combs her hair.
The beauty of a woman
must be seen from in her eyes;
Because that's the doorway to her heart,
the place where love resides.
The beauty of a woman
isn't in a facial mole;
But true beauty in a woman,
is reflected by her soul.
It's the caring that she cares to give,
the passion that she shows;
And the beauty of a woman
with passing years only grows
Monday, November 8, 2010
Sunday, October 3, 2010
Forget Gandhi - Move on !!!
Writing after a long time in response to around 7 blogs that I have read yesterday, all dedicated to the man in the picture below.........
गाँधी जयंती के अवसर पे काफी लेख पढने ओ मिले , सब ने गाँधी जी के चरित्र की बात की उनके योगदान की बात की और न जाने क्या क्या . हर लेख को पढने में अपना सर घुमाना परता है , यार इतनी अच्छी हिंदी में लिखते है की पढना मुश्किल हो जाता है फिर गाँधी कम और हिंदी ज्यादा याद आती है . किसी को उनसे शिकायत है की वो वो नहीं थे जो हम उन्हें बना बैठे है तो कोई यह समझता है की वो वही थे जो हम उन्हें बना चुके हैं - देखा मैंने भी अच्छी हिंदी लिख दी . येही बात पसंद है मुझे गाँधी जी के बारे में जब भी उनके बारे में लिकोगे तो इतनी अची हिंदी दिमाग से निकलती है की बस मत पूछो . खैर बात गाँधी (जी) की उठी है तो मैं भी कुछ बोलने पर मजबूर हो गया हूँ , पर मैं किसी के तरफ नहीं हूँ इसीलिए () में जी लिखा ताकि किसी को भी कस्ट न हो .
मुझे गाँधी (जी ) से कोई लगाव नहीं है न ही नफरत है , पर उनकी कुछ बातें अची लगती है . अब इसका यह मतलब नहीं है की हर साल उनके जन्म के लिए हम छुट्टी मनाएं . कभी किसी ने मेरे जन्मदिन पे छुट्टी मनाई है - जो जिंदा है हम उनकी फिकर ही नहीं करते और जो ऊपर जा चुके हैं हम उनको बार बार निचे किचते रहते है . उन्होंने लारी की देश के लिए ६० साल पहले तो क्या अभी लोग नहीं लरते है अपने देश के लिए - मैं भी लार्ता हूँ कभी कभी अपने परोसी से जिसको मैं पाकिस्तानी के नाम से जनता हूँ . उन्होंने सादगी सिखाई कम कपरे पहनो , सत्य बोलो , सादगी से रहो - वो तो अभी भी लोग सिखाते हैं पर हम न तो पहले मानते थे न अब मानते हैं . मेरे कहने का यह मतलब है की अभी भी आपको आस पास बहुत सरे गाँधी मिल जायेंगे बस आप देखना नहीं चाहते . मन में एक तस्वीर बैठा ली है की गोल सा चस्मा सफ़ेद धोती (तेज दिमाग - बदमाश जैसा कुछ लोग कहते है ) , और इस तस्वीर से बहार हम देकना नहीं चाहते इसीलिए उस एक गाँधी के पीछे अभी तक परे हुए है गाँधी से सूट भी पहना करते थे पर हम कभी उन्हें उस रूप में नहीं देखना चाहते .वही बात है अब गाँधी क्या थे कैसे थे यह अब कोई नहीं जनता पर हर कोई अपने मन के हिसाब से उनका चरित्र वर्णन करने लग जाता है .बक्श दो जीते जी तो इतना सुना ही उसने अब मरने के ६० साल बाद तक भी लोग उसी के बारे में बोलते रहेंगें तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी . सही बात यह है की गाँधी जी एक सामान इंसान थे और यह उन्होंने हीं कहा था बस हम यह मानने को टायर नहीं है.
बेहतर यह होगा की हम अपने आस पास के लोगों में गाँधी को ढूंढे और उस महात्मा को शांति से सोने दे . सही है न जो बीत गयी सो बात गयी ................
गाँधी जयंती के अवसर पे काफी लेख पढने ओ मिले , सब ने गाँधी जी के चरित्र की बात की उनके योगदान की बात की और न जाने क्या क्या . हर लेख को पढने में अपना सर घुमाना परता है , यार इतनी अच्छी हिंदी में लिखते है की पढना मुश्किल हो जाता है फिर गाँधी कम और हिंदी ज्यादा याद आती है . किसी को उनसे शिकायत है की वो वो नहीं थे जो हम उन्हें बना बैठे है तो कोई यह समझता है की वो वही थे जो हम उन्हें बना चुके हैं - देखा मैंने भी अच्छी हिंदी लिख दी . येही बात पसंद है मुझे गाँधी जी के बारे में जब भी उनके बारे में लिकोगे तो इतनी अची हिंदी दिमाग से निकलती है की बस मत पूछो . खैर बात गाँधी (जी) की उठी है तो मैं भी कुछ बोलने पर मजबूर हो गया हूँ , पर मैं किसी के तरफ नहीं हूँ इसीलिए () में जी लिखा ताकि किसी को भी कस्ट न हो .
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| Endless life....... |
बेहतर यह होगा की हम अपने आस पास के लोगों में गाँधी को ढूंढे और उस महात्मा को शांति से सोने दे . सही है न जो बीत गयी सो बात गयी ................
Thursday, August 12, 2010
Memoirs !!
Just trying my hands at collage, inspired by Sudesh. To have an engineer as your friend has an advantage that he keeps on reminding you that you lag behind when it comes to technology. Koi bat nahi har ............. ka din ata hai.
Medical Schools are a hell for your creativity and enjoyment. In such a draconian place there are a few moments to cherish one of them being SP in January. The marvelous decorations coupled with individual elegance makes it a memorable affair.
Monday, August 2, 2010
Ode to St.Paul's
ST PAUL"S
The first thing that comes to mind of the word "ode" is a poem of Thomas Hardy, the next we were in Std.9 and some south Indian taught us (forgot his name). Even now there many things that reminds me instinctively of my school days - * Like the prepositions Sudesh had an unparalleled aptitude for them he would bombard them untill we got one wrong (it didn't take long :-) quick),
* Whenever I feel sleepy in a lecture Mrs Mamta Sahu floats in- I slept in nearly all of her classes and Nibir slept behind me. Interestingly I was never caught and even more interestingly Nibir was caught and had a fair bit of questioning on Caesar's wife. Course he didn't answer and that set the questioner on fire.... actually we had resolved not to comment on other's wives but she didn't know it, we were being noble.
* Whenever someone around me keeps on talking without a break Nikita and Ashutosh fly in, they would talk continuously at times to no use while at others lead to a smile.
* And yes whenever I hear an intelligent comment Ankur reminds me of himself. He used to comment on anything and everything, none of which could penetrate our thick brain but we were kind enough to smile !
*A beautiful teacher (there are none in the college of course but serials often through up a few) and all you can remember is Mrs Shipra, most of us kept on speculating how beautiful she would have been in her younger days (not me) and Prashant Ranjan made a habit of mentioning it every now and then.
*Sir Sarit Ghosh, he remains one of the most memorable people I have ever met. Whether it was his perfect anchoring, his scooter (someone tried to deflate it once), his threats of calling the parents or his teaching of History ( I never thought I would enjoy History, but I did) assembeled with an array of topics ranging from todays news to an actors nick name and many more. He was the most mimicked teachers of our time.
*And at last Miss Ganguly, she remains the best teacher I have ever come across and she is why I took to books and made a career.
Haaappppyyyy Biiiirrrrtttthhhdddaaayyy.
Wednesday, July 28, 2010
Ijjat ka zanaja !!
अज से करीब दो महीने बाद नयी दिल्ली में commonwealth खेल होने जा रहे हैं . दुनिए ,के तीसरे सांसे बारे खेलों की मेजबानी करना किसी भी देश के लिए फक्र की बात होनी चाहिए और खास के एक उभरते हुए देश के लिए क्यूंकि अपनी बढती साख को दुनिए के सामने रखने का इससे शरीफ तरीका कोई हो ही नहीं सकता. २००८ में चीन ने इसका एक सुन्दर नमूना पेश किया था जब उसने बीजिंग ओलंपिक्स को बारे हीं भव्य तरीके से दुनिए के सामने प्रस्तुत किया था, पूरी दुनिए हैरान थी और उसके परोसी यानि हम परेशान थे . क्या हम ऐसा नहीं कर सकते , उसी वर्ष हमें कोम्मोंवेअल्थ खेलों की मेजबानी मिल गयी, चीन से बराबरी करने का अवसर . आप मानें या न मानें दोनों देश के बीच आगे बढ़ने की होर तो लगी ही रहती है , भारत भी इन सबसे परे नहीं हैं . खैर मौका तो मिल गया और अब उसका परिणाम भी दिखने ही वाला है , क्या ?
ज्यादा तो कुछ नहीं पर नेहरु स्तादियम जो इन खेलों का मुख्य स्तःल है उसकी हालत यह है की अभी तक पूरा हो नहीं सका है . रही सही कसार मुसलाधार बारिश ने पूरी कर दी है , जो बना था उसे भी फिर से बनान पर रहा है . आप २ महीने में तो शाहजहाँ भी कोई ईमारत नहीं बना सकता था ऐसे में दिल्ली सरकार की क्या औकात है .यह वाकई चमत्कार होगा अगर ये खेल सफलतापूर्वक समाप्त हो गयें. वरना हमारी जो बेज्जती होने वाली है उसके बारे में सोच के बहुत अजीब सा लगता है . खुद दीली की सरकार को सोइचना चाहिए की अगर वो तयारी नहीं कर सकती थी तो उसने मेजबानी का दावा क्यूँ ठोका . डींगे मरने में हमारी सरकारें कभी पीछे नहीं रही हैं और कम करने में कभी आगे अनहि रही हैं . ऐसे में सरकार की बेज्जती होती है तो होने दो , उनकी आदत है बीजती सहने की .पर पूरा देश उनके किये धरे का असर क्यूँ झेले . हमने तो नहीं कहा था मेजबानी करने के लिए और न हीं यह कहा था की हरे इज्जत तक पे रख दो ! बाकि कुछ जानना हो तो times of India की यह खबर जरूर पढियेगा .
http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2010/07/27/commonwealth-games-receives-media-bashing/
http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2010/07/27/commonwealth-games-receives-media-bashing/
Tuesday, July 20, 2010
Jane tu ya jane na
पिछले एक वर्ष में ट्रेन दुर्घटनाएं तो जैसे आम बात बन गयीं हैं ! एक की याद मिटती नहीं की दूसरी सामने आ जाति है ! वजह कई सरे हो सकते हैं पर अंत में भुगतना तो आम आदमी को ही परता हैं न ! कांग्रेस की आम आदमी की सरकार आम आदमी को चोर कर बाकि सब की सरकार बंनी हुई है ! भारत की रेल मंत्री रेल मंत्रालय को चोर कर बाकि सब जगह दिखाई परती हैं , रेल को छोर हर बात पर अपनी राय देती है और अपना काम छोर कर बाकि सब के काम को जानती हैं , इन सब चीजों के बाद भी वो इस देश की रेल मंत्री हैं और यह फिलहाल इस देश की सबसे बड़ी बदकिस्मती है ! हो सकता यह हादसा किसी मानविक भूल के कारन हुआ हो पर इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है की भूल वही होती है जहाँ प्रशाशन बेपरवाह होती है ! और इस वक़्त रेल मंत्रालय इसका जीते जगाता साबुत है ! इतनी हादसों के बाद भी अगर ममता बनर्जी अपना पद नहीं छोरती हैं तो यह पुरे भारत के लिए शर्म की बात होगी .
Thursday, June 3, 2010
Doctors- Lambi Dagar
हर दिन आप अख़बार में IIT IIM के बारे में पढ़ते रहते हैं , उनकी कामयाबी, पैसों का अम्बर ,नौकरी और भी न जाने क्या क्या . शायद हीं कभी अपने कुछ ऐसा मेडिकल कॉलेज के बारे में सुना होगा .क्यूँ ? क्या मेडिकल कॉलेज में पढाई नहीं होती , या वहां पढ़ के कोई ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पता , या फिर मेडिकल की पढाई किसी काम की नहीं है .बाकि की तो छूर दो शायद हीं कभी AIIMS का नाम सुने मिलता है वो भी किसी गलत कारन के लिए .
वजह क्या है - दर्ससल हम हिन्दुस्तानी "shortcut" के दीवाने हैं . हमें सब कुछ फटा फट चाहिए कामयाबी, शोहरत, नाम, घर -बा,र बीवी और न जाने क्या क्या . इंतज़ार करने की आदत हमारी तो नहीं है . भले ही इसके लिए लाइन तोरनी परती हो ,गलियां खानी परती हो या कभी कभी मार , सब कुछ मंजूर है पर दो पल इंतज़ार नहीं .इसी फटा फट के चलते हम सिर्फ उन्ही चीज़ों को देखना चाहते हैं जिनमे ये गुन व्याप्त है . आज मेरे कई भाई - बहन इन्जिनीर्स या और कुछ बनने जा रहें है और हर दिन पापा से येही सुनने को मिलता है " बेटा शर्म करो तुमसे पहले कमाएंगे तुमसे पहले ज़िन्दगी में सब कुछ करेंगे ( शादी भी ). " सुन के कभी कभी लगता है की शुरुआत तो साथ की फिर हम पीछे कैसे रह गए .और हैं तो हिन्दुस्तानी हीं इंतज़ार की बात सुनते हीं दिमाग काम करना बंद कर देता है . फिर लगता है की कौन सी पल था जब डॉक्टर बन्ने का विचार आया . खैर मैं तो यह सोच के खुश हो लेता हूँ की डॉक्टर बना पापा के कहने पे , तो कुछ भी हो नारियल अपने सर पे तो नहीं फूटेगा . पर जो घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ डॉक्टर बनने आ गए हैं उनके उपार तो नारियल क्या पूरे नारियल का पेड़ गिरने की आशंका बनी रहेगी .
अब जो कुछ लिख रहा हूँ वो अपने जैसे लोगों को दिलासा देने के लिए हैं - इंतज़ार का फल मीठा होता है , अरे इतना भी क्या इंतज़ार की फल पाने की ख्वाइश ही खो जाये . कोई भारत सरकार को समझाए 9-१० साल पढ़ते पढ़ते बिता देना कितनी बरी चीज़ हैं . खुद तो कई नेता मेट्रिक तक पढ़ नहीं पते पर हमें पढाई करने का उपदेश देने से बाज नहीं आते .और तो और जनता की सेवा करने की सिख भी देते है (rural service-1 yr). यार पढ़ के तो वही करेंगे लोगों की सेवा . सवाल यह है की हर बार यह सिख सिर्फ हमें हीं क्यूँ दी जाति हैं , कभी उन इन्जिनीर्स को भी कहा करो जो सरकार के पैसे पे पढ़ कर विदेश प्रस्थान कर जाते हैं ,उन मैनेजमेंट वालों को भी कहो जो सिर्फ पैसे गिनते हैं - हर बार सूली पे हमी क्यूँ चढ़ें .एक तो वैसे हीं हिन्दुस्तानी होकर इंतज़ार कर रहें हैं ऊपर से हमारा शुक्रिया अदा करने के बजाये हमारी हीं band बजा रहे हो . येही सिलसिला रहा तो शायद ऐसा भी एक दिन आयेगा जब कोई डॉक्टर बनने को तयार नहीं होगा (आखिर कामयाबी और बीबी किसे नहीं चाहिए....).
इसीलिए शिक्षा मंत्रालय को विनम्र से बोल रहें है " सुधर जा मामू नहीं तो देश की waat लग जाएगी "
वजह क्या है - दर्ससल हम हिन्दुस्तानी "shortcut" के दीवाने हैं . हमें सब कुछ फटा फट चाहिए कामयाबी, शोहरत, नाम, घर -बा,र बीवी और न जाने क्या क्या . इंतज़ार करने की आदत हमारी तो नहीं है . भले ही इसके लिए लाइन तोरनी परती हो ,गलियां खानी परती हो या कभी कभी मार , सब कुछ मंजूर है पर दो पल इंतज़ार नहीं .इसी फटा फट के चलते हम सिर्फ उन्ही चीज़ों को देखना चाहते हैं जिनमे ये गुन व्याप्त है . आज मेरे कई भाई - बहन इन्जिनीर्स या और कुछ बनने जा रहें है और हर दिन पापा से येही सुनने को मिलता है " बेटा शर्म करो तुमसे पहले कमाएंगे तुमसे पहले ज़िन्दगी में सब कुछ करेंगे ( शादी भी ). " सुन के कभी कभी लगता है की शुरुआत तो साथ की फिर हम पीछे कैसे रह गए .और हैं तो हिन्दुस्तानी हीं इंतज़ार की बात सुनते हीं दिमाग काम करना बंद कर देता है . फिर लगता है की कौन सी पल था जब डॉक्टर बन्ने का विचार आया . खैर मैं तो यह सोच के खुश हो लेता हूँ की डॉक्टर बना पापा के कहने पे , तो कुछ भी हो नारियल अपने सर पे तो नहीं फूटेगा . पर जो घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ डॉक्टर बनने आ गए हैं उनके उपार तो नारियल क्या पूरे नारियल का पेड़ गिरने की आशंका बनी रहेगी .
अब जो कुछ लिख रहा हूँ वो अपने जैसे लोगों को दिलासा देने के लिए हैं - इंतज़ार का फल मीठा होता है , अरे इतना भी क्या इंतज़ार की फल पाने की ख्वाइश ही खो जाये . कोई भारत सरकार को समझाए 9-१० साल पढ़ते पढ़ते बिता देना कितनी बरी चीज़ हैं . खुद तो कई नेता मेट्रिक तक पढ़ नहीं पते पर हमें पढाई करने का उपदेश देने से बाज नहीं आते .और तो और जनता की सेवा करने की सिख भी देते है (rural service-1 yr). यार पढ़ के तो वही करेंगे लोगों की सेवा . सवाल यह है की हर बार यह सिख सिर्फ हमें हीं क्यूँ दी जाति हैं , कभी उन इन्जिनीर्स को भी कहा करो जो सरकार के पैसे पे पढ़ कर विदेश प्रस्थान कर जाते हैं ,उन मैनेजमेंट वालों को भी कहो जो सिर्फ पैसे गिनते हैं - हर बार सूली पे हमी क्यूँ चढ़ें .एक तो वैसे हीं हिन्दुस्तानी होकर इंतज़ार कर रहें हैं ऊपर से हमारा शुक्रिया अदा करने के बजाये हमारी हीं band बजा रहे हो . येही सिलसिला रहा तो शायद ऐसा भी एक दिन आयेगा जब कोई डॉक्टर बनने को तयार नहीं होगा (आखिर कामयाबी और बीबी किसे नहीं चाहिए....).
इसीलिए शिक्षा मंत्रालय को विनम्र से बोल रहें है " सुधर जा मामू नहीं तो देश की waat लग जाएगी "
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